परिचय

आध्यात्मिक विश्वविद्यालय

आध्यात्मिक विश्वविद्यालय में आपका स्वागत है, आध्यात्मिक विश्वविद्यालय किसी भी व्यक्ति को आध्यात्म अथवा सत्य का मार्ग प्रदर्शित नहीं करता है और नाहीं किसी भी व्यक्ति को आध्यात्म अथवा सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्रदान करता है किन्तु जो व्यक्ति स्वयं अपनी इच्छा से सत्य-कर्म के मार्ग पर चलने के इच्छुक है या जो व्यक्ति सत्य-कर्म के मार्ग से विचलित होकर भटक गए है या जो व्यक्ति असत्य-कर्म के कारण किसी भी प्रकार के दुख, दरिद्रता या चिंता से परेशान है या जो व्यक्ति असत्य-कर्म का त्याग करना चाहते है तो ऐसे व्यक्तियों को सत्य-कर्म का मार्ग प्रदर्शित करना ही आध्यात्मिक विश्वविद्यालय का मुख्य कार्य, लक्ष्य एवं उद्देश्य है।

सत्य-कर्म के मार्ग पर चलने से कोई भी व्यक्ति साधु-संत या सन्यासी नहीं बनते है और नाहीं किसी भी प्रकार का ढोंग या पाखंड करते है बल्कि सभी प्रकार के सांसारिक एवं भौतिक सुखों का सम्पूर्ण आनंद लेते हुए अंत में मोक्ष अथवा शांति प्राप्त करते है जो किसी भी असत्य-कर्म करने वाले व्यक्ति के लिए दुर्लभ या असंभव है, आरंभ में असत्य-कर्म का त्याग कर सत्य-कर्म के मार्ग पर चलने से कुछ समस्या आती है जो असत्य-कर्म के फल स्वरुप सामने नजर आते है किन्तु निरंतर अपने आत्म-प्रयास से व्यक्ति अपने जीवन के समस्याओं के निल नदी को सरलता से पार करके अपने परिवार एवं बच्चों के साथ दीर्घ आयु तक सुखमय जीवन व्यतीत करते है।

श्री अजीत कुमार
संस्थापक, संचालक एवं मार्गदर्शक

सिद्धांत

शुद्धिकरण

प्रथम सिद्धांत : जब हमारा घर गन्दा होता है तो उसे हम स्वयं साफ़ करते है, यदि हमारा शरीर गन्दा होता है तो उसे भी हम स्वयं साफ़ करते है और यदि हमारा कपड़ा गन्दा होता है तो उसे भी हम स्वयं साफ़ करते है तथा विषम प्रस्थतियों में किसी अन्य व्यक्ति से साफ़ करवाते है किन्तु कभी भी हम अपने घर, शरीर या कपड़ें की गंदगी को गन्दा नहीं छोड़ते है अन्यथा गंदगी से बीमारी होने का भय रहता है और यदि सही समय पर बीमारी का इलाज नहीं किया गया तो यह बीमारी एक लाईलाज बीमारी बन जाता है तथा लाईलाज बीमारी से हमारे शरीर की मृत्यु होने का भय रहता है।

द्वितीय सिद्धांत : ठीक इसी प्रकार जब किसी व्यक्ति की आत्मा असत्य-कर्म के कारण अशुद्ध या अपवित्र हो जाता है तो वह व्यक्ति इसे स्वयं साफ़ करते है एवं विषम प्रस्थति में किसी अन्य व्यक्ति से साफ़ करवाते है किन्तु यह अन्य व्यक्ति असत्य-कर्म को साफ करने का ढोंग करते है और केवल अपना स्वार्थ सिद्ध करते है तथा उस व्यक्ति के आत्मा की मुख्य गंदगी असत्य-कर्म को छोड़ देते है तथा निरंतर असत्य-कर्म करने से उस व्यक्ति की आत्मा पूर्ण रूप से अशुद्ध एवं अपवित्र हो जाता है तथा आत्मा के पूर्ण रूप से अशुद्ध एवं अपवित्र होने से शुद्ध एवं पवित्र आत्मा की मृत्यु होने का भय रहता है।



आत्म-शक्ति

शिव(परमेश्वर) की ओर पहला कदम

सत्य-कर्म का फल अमृत के समतुल्य है जिसका सेवन करने से किसी भी व्यक्ति के जीवन में सुख, समृद्धि एवं शांति प्राप्त होता है तथा असत्य-कर्म का फल विष के समतुल्य है जिसका सेवन करने से किसी भी व्यक्ति के जीवन में दुख, दरिद्रता एवं चिंता प्राप्त होता है अतः यदि किसी भी व्यक्ति के जीवन में किसी भी प्रकार का दुख, दरिद्रता या चिंता अथवा असाध्य बीमारी या समस्या है तो निश्चित ही यह स्वयं अथवा माता-पिता या पूर्वजों के द्वारा किये गए असत्य-कर्म का फल है जो कर्ज अथवा ऋण के रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी चलता है तथा अगली संतान अथवा पीढ़ी को विरासत के रूप में प्राप्त होता है।

जिस व्यक्ति की आत्म-शक्ति असत्य-कर्म के कारण नष्ट हो गया है या आत्म-शक्ति जागृत नहीं है ऐसे व्यक्ति उचित मार्गदर्शन प्राप्त करके पुनः अपने आत्म-शक्ति को जागृत कर सकते है तथा जिस व्यक्ति की आत्म-शक्ति जागृत हो जाता है या जिस व्यक्ति की आत्म-शक्ति पहले से जागृत है ऐसे व्यक्ति पूर्ण रूप से अपने आत्म-शक्ति को जागृत करके गंगा-स्नान के द्वारा अपने आत्मा को शुद्ध एवं पवित्र कर सकते है तथा जिस व्यक्ति की आत्मा गंगा-स्नान के द्वारा शुद्ध एवं पवित्र हो जाता है ऐसे व्यक्ति सत्य-कर्म करने में स्वयं सक्षम हो जाते है तथा सत्य-कर्म के द्वारा अपने जीवन में सुख, समृद्धि एवं शांति प्राप्त करते है।

आत्म-शक्ति परिक्षण विधि
किसी भी व्यक्ति के द्वारा अपने आत्मा-शक्ति का मूल्यांकन करना ही आत्म-शक्ति परिक्षण है तथा जिस व्यक्ति की आत्म-शक्ति असत्य-कर्म के कारण नष्ट हो गया है ऐसे व्यक्ति पुनः उचित मार्गदर्शन के द्वारा अपनी योग्यता एवं सामर्थ के अनुसार अपने आत्म-शक्ति को जागृत कर सकते है तथा जिस व्यक्ति की आत्म-शक्ति जागृत हो जाता है ऐसे व्यक्ति गंगा-स्नान के द्वारा अपने आत्मा को शुद्ध एवं पवित्र करने में सक्षम हो जाते है।

आत्म-शक्ति

नामांकन शुल्क : निःशुल्क

आत्म-शक्ति परिक्षण एवं प्रबंधन

आयु सिमा9 से 36 वर्ष

जीवन-साथी एवं अपनी संतानवैकल्पिक

स्वरोजगार या व्यवसायवैकल्पिक


शैक्षणिक योग्यता10 + 2 या समकक्ष

कंप्यूटर का बेसिक ज्ञानअनिवार्य

भाषा का ज्ञानहिंदी एवं अंग्रेजी


मार्गदर्शन माध्यमऑनलाइन

साप्ताहिक मार्गदर्शन2 घंटा (1 दिन)

मार्गदर्शन अवधि3 माह (11 दिन)

मार्गदर्शन शुल्क : ₹ 51,000.00/-

गंगा-स्नान

शुद्धिकरण

गंगा-स्नान
जब भी कोई आत्मा सत्य-कर्म करने के उद्देश्य से मानव रूपी वस्त्र को धारण करते है तो हमारे समाज की मुख्य गंदगी असत्य-कर्म के कारण किसी भी व्यक्ति की आत्मा अशुद्ध एवं अपवित्र हो जाता है तथा पुनः अपने आत्मा को शुद्ध एवं पवित्र करने की प्रक्रिया को गंगा-स्नान कहते है तथा जिस व्यक्ति की आत्म एक बार गंगा-स्नान के द्वारा शुद्ध एवं पवित्र हो जाता है ऐसे व्यक्ति आजीवन सत्य-कर्म करने में स्वयं सक्षम हो जाते है।

गंगा-स्नान (आत्म-ज्ञान)

नामांकन शुल्क : ₹ 1,51,000.00/-

अज्ञानता से मुक्ति

आयु सिमा18 से 36 वर्ष

जीवन-साथी एवं अपनी संतानअनिवार्य

रोजगार या व्यवसायअनिवार्य


योग्यताआत्म-शक्ति (परिक्षण) में उत्तीर्ण

कंप्यूटर का बेसिक ज्ञानअनिवार्य

भाषा का ज्ञानहिंदी एवं अंग्रेजी


मार्गदर्शन माध्यमऑनलाइन

साप्ताहिक मार्गदर्शन2 घंटा (1 दिन)

मार्गदर्शन अवधि12 माह (50 दिन)

मार्गदर्शन शुल्क : ₹ 11,00,000.00/-

मार्गदर्शन

सुख, समृद्धि एवं शांति का प्रवेश द्वार / सुख, समृद्धि एवं शांति का मार्ग

मानव
हिन्दू धर्म के अनुसार महा-माया के तीन पुत्र ब्रम्हा, विष्णु एवं शिव तथा इनकी धर्म-पत्नी क्रमश सरस्वती, लक्ष्मी एवं पार्वती का वर्णन मिलता है किन्तु वास्तव में मानव को कर्म का ज्ञान देने के उद्देश्य से यह तीनों देवी-देवता एक ही दम्पति(स्त्री-पुरुष) के जीवन में आयु, रूप एवं कर्म का वर्णन है तथा विश्व का कोई भी व्यक्ति अपने आयु, रूप एवं कर्म के अनुसार बाल-अवस्था(कलयुग) में हनुमान के रूप में शूद्र का कार्य करते है, युवा अवस्था(द्वापर-युग) में कृष्ण-राधा के रूप में वैश्य का कार्य करते है, वयस्क अवस्था(त्रेता-युग) में ब्रम्हा-सरस्वती एवं राम-सीता के रूप में क्षत्रिय का कार्य करते है तथा वृद्ध अवस्था(सत्य-युग) में शिव-पार्वती के रूप में ब्राम्हण का कार्य करते है।

कल-युग
जब किसी व्यक्ति का जन्म होता है तो वह व्यक्ति सर्वप्रथम कलयुग में निवास करते है तथा किसी भी बच्चें को बंदर अथवा हनुमान का रूप कहते है तथा हनुमान(बच्चों) को शिव-पार्वती(दादा-दादी) का रूप अथवा अवतार कहते है तथा कोई भी व्यक्ति बाल-अवस्था में अपने माता-पिता(सीता-राम) या अभिभावक(जो पालन करते है) की निस्वार्थ भाव से शूद्र(नौकर या दास) के रूप में सेवा या कार्य करके अपने शूद्र धर्म का पालन करते है।

द्वापर-युग
जब कोई व्यक्ति कलयुग से द्वापर युग में पहुँचते है अर्थात बाल अवस्था से युवा अवस्था में जाते है तो कृष्ण के रूप में स्वयं विष्णु का अवतार होते है तथा कृष्ण की तरह गोपियों के संग क्रीड़ा करना तथा कंश(राजा अथवा चोर) जो उसके घर से दूध/दही/घी/माखन अर्थात घन की चोरी(टैक्स के रूप में) करता है ऐसे कंश(राजा अथवा चोर) का विनाश करना तथा अपने मित्र एवं गोपियों की रक्षा करना एवं कालिया-नाग के विष से यमुना नदी के जल को साफ़ करना स्वयं कृष्ण का कार्य है तथा कृष्ण मुख्य रूप से दूध का व्यवसाय करके अपने वैश्य धर्म का पालन करते है।

त्रेता-युग
जब कोई व्यक्ति द्वापर-युग से त्रेता-युग में पहुँचते है अर्थात युवा से वयस्क होते है अर्थात कोई भी व्यक्ति विवाह हो जाने के बाद राम के रूप में स्वयं विष्णु का अवतार होते है तथा एक दम्पति सीता एवं राम के साथ ब्रम्हा एवं सरस्वती के भी अवतार होते है, जब एक दंपत्ति अपने बच्चें को जन्म देते है तो पिता ब्रम्हा के रूप में अपने बच्चे का भविष्य निर्धारित करते है एवं एक माता सरस्वती के रूप है अपने बच्चे को बोलना, चलना, लिखना, पढ़ना इत्यादि सिखाती है तथा राम के रूप में अपने परिवार एवं बच्चों की सुरक्षा एवं पालन-पोषण करके अपने क्षत्रिय धर्म का पालन करते है।

सत्य-युग
किसी भी अविवाहित व्यक्ति या जिसकी अपनी संतान नहीं हो उसके लिए सत्य-युग में पहुंचना असंभव है अतः जब कोई दंपत्ति जिनकी अपनी संतान हो और वह त्रेता-युग से सत्य-युग में पहुँचते है तो वह अपना सबकुछ अर्जित किया हुआ ज्ञान एवं धन-संपत्ति अपने बच्चों को दान कर देते है तथा दान करने वाले माता-पिता स्वयं शिव एवं पार्वती का रूप होते है तथा दानी से बड़ा कोई ज्ञानी नहीं है और जो अपना सबकुछ अपने बच्चों को दान करके स्वयं अपने बच्चों से भिक्षा मांगकर खाते है वह अपने ब्राम्हण धर्म का पालन करते है।

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