आध्यात्मिक विश्वविद्यालय में आपका स्वागत है, आध्यात्मिक विश्वविद्यालय किसी भी व्यक्ति को आध्यात्म अथवा सत्य का मार्ग प्रदर्शित नहीं करता है और नाहीं किसी भी व्यक्ति को आध्यात्म अथवा सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्रदान करता है किन्तु जो व्यक्ति स्वयं अपनी इच्छा से सत्य-कर्म के मार्ग पर चलने के इच्छुक है या जो व्यक्ति सत्य-कर्म के मार्ग से विचलित होकर भटक गए है या जो व्यक्ति असत्य-कर्म के कारण किसी भी प्रकार के दुख, दरिद्रता या चिंता से परेशान है या जो व्यक्ति असत्य-कर्म का त्याग करना चाहते है तो ऐसे व्यक्तियों को सत्य-कर्म का मार्ग प्रदर्शित करना ही आध्यात्मिक विश्वविद्यालय का मुख्य कार्य, लक्ष्य एवं उद्देश्य है।
सत्य-कर्म के मार्ग पर चलने से कोई भी व्यक्ति साधु-संत या सन्यासी नहीं बनते है और नाहीं किसी भी प्रकार का ढोंग या पाखंड करते है बल्कि सभी प्रकार के सांसारिक एवं भौतिक सुखों का सम्पूर्ण आनंद लेते हुए अंत में मोक्ष अथवा शांति प्राप्त करते है जो किसी भी असत्य-कर्म करने वाले व्यक्ति के लिए दुर्लभ या असंभव है, आरंभ में असत्य-कर्म का त्याग कर सत्य-कर्म के मार्ग पर चलने से कुछ समस्या आती है जो असत्य-कर्म के फल स्वरुप सामने नजर आते है किन्तु निरंतर अपने आत्म-प्रयास से व्यक्ति अपने जीवन के समस्याओं के निल नदी को सरलता से पार करके अपने परिवार एवं बच्चों के साथ दीर्घ आयु तक सुखमय जीवन व्यतीत करते है।
श्री अजीत कुमार
संस्थापक, संचालक एवं मार्गदर्शक
मानव
हिन्दू धर्म के अनुसार महा-माया के तीन पुत्र ब्रम्हा, विष्णु एवं शिव तथा इनकी धर्म-पत्नी क्रमश सरस्वती, लक्ष्मी एवं पार्वती का वर्णन मिलता है किन्तु वास्तव में मानव को कर्म का ज्ञान देने के उद्देश्य से यह तीनों देवी-देवता एक ही दम्पति(स्त्री-पुरुष) के जीवन में आयु, रूप एवं कर्म का वर्णन है तथा विश्व का कोई भी व्यक्ति अपने आयु, रूप एवं कर्म के अनुसार बाल-अवस्था(कलयुग) में हनुमान के रूप में शूद्र का कार्य करते है, युवा अवस्था(द्वापर-युग) में कृष्ण-राधा के रूप में वैश्य का कार्य करते है, वयस्क अवस्था(त्रेता-युग) में ब्रम्हा-सरस्वती एवं राम-सीता के रूप में क्षत्रिय का कार्य करते है तथा वृद्ध अवस्था(सत्य-युग) में शिव-पार्वती के रूप में ब्राम्हण का कार्य करते है।
कल-युग
जब किसी व्यक्ति का जन्म होता है तो वह व्यक्ति सर्वप्रथम कलयुग में निवास करते है तथा किसी भी बच्चें को बंदर अथवा हनुमान का रूप कहते है तथा हनुमान(बच्चों) को शिव-पार्वती(दादा-दादी) का रूप अथवा अवतार कहते है तथा कोई भी व्यक्ति बाल-अवस्था में अपने माता-पिता(सीता-राम) या अभिभावक(जो पालन करते है) की निस्वार्थ भाव से शूद्र(नौकर या दास) के रूप में सेवा या कार्य करके अपने शूद्र धर्म का पालन करते है।
द्वापर-युग
जब कोई व्यक्ति कलयुग से द्वापर युग में पहुँचते है अर्थात बाल अवस्था से युवा अवस्था में जाते है तो कृष्ण के रूप में स्वयं विष्णु का अवतार होते है तथा कृष्ण की तरह गोपियों के संग क्रीड़ा करना तथा कंश(राजा अथवा चोर) जो उसके घर से दूध/दही/घी/माखन अर्थात घन की चोरी(टैक्स के रूप में) करता है ऐसे कंश(राजा अथवा चोर) का विनाश करना तथा अपने मित्र एवं गोपियों की रक्षा करना एवं कालिया-नाग के विष से यमुना नदी के जल को साफ़ करना स्वयं कृष्ण का कार्य है तथा कृष्ण मुख्य रूप से दूध का व्यवसाय करके अपने वैश्य धर्म का पालन करते है।
त्रेता-युग
जब कोई व्यक्ति द्वापर-युग से त्रेता-युग में पहुँचते है अर्थात युवा से वयस्क होते है अर्थात कोई भी व्यक्ति विवाह हो जाने के बाद राम के रूप में स्वयं विष्णु का अवतार होते है तथा एक दम्पति सीता एवं राम के साथ ब्रम्हा एवं सरस्वती के भी अवतार होते है, जब एक दंपत्ति अपने बच्चें को जन्म देते है तो पिता ब्रम्हा के रूप में अपने बच्चे का भविष्य निर्धारित करते है एवं एक माता सरस्वती के रूप है अपने बच्चे को बोलना, चलना, लिखना, पढ़ना इत्यादि सिखाती है तथा राम के रूप में अपने परिवार एवं बच्चों की सुरक्षा एवं पालन-पोषण करके अपने क्षत्रिय धर्म का पालन करते है।
सत्य-युग
किसी भी अविवाहित व्यक्ति या जिसकी अपनी संतान नहीं हो उसके लिए सत्य-युग में पहुंचना असंभव है अतः जब कोई दंपत्ति जिनकी अपनी संतान हो और वह त्रेता-युग से सत्य-युग में पहुँचते है तो वह अपना सबकुछ अर्जित किया हुआ ज्ञान एवं धन-संपत्ति अपने बच्चों को दान कर देते है तथा दान करने वाले माता-पिता स्वयं शिव एवं पार्वती का रूप होते है तथा दानी से बड़ा कोई ज्ञानी नहीं है और जो अपना सबकुछ अपने बच्चों को दान करके स्वयं अपने बच्चों से भिक्षा मांगकर खाते है वह अपने ब्राम्हण धर्म का पालन करते है।
गंगा-स्नान: कोई भी व्यक्ति सत्य-कर्म करने के उद्देश्य से स्वयं मानव रूपी वस्त्र को धारण करते है किन्तु मानव रुपी वस्त्र धारण करने के बाद समाज की मुख्य गंदगी असत्य-कर्म के कारण किसी भी व्यक्ति की आत्मा अशुद्ध एवं अपवित्र हो जाता है जिसके कारण सत्य-कर्म करना दुर्लभ या असंभव हो जाता है तथा आत्मा को पुनः शुद्ध एवं पवित्र करने की प्रक्रिया को गंगा स्नान अथवा आत्मा का पुर्नजन्म कहते है जिसके बाद कोई भी व्यक्ति पुनः सत्य-कर्म करने में सक्षम हो जाते है।
सत्य-कर्म: जिस कर्म को करने से किसी भी दूसरे व्यक्ति को किसी भी प्रकार का कष्ट अथवा क्षोभ नहीं होता है उसे सत्य-कर्म कहते है एवं सत्य-कर्म करने के लिए किसी भी व्यक्ति के आत्मा का शुद्ध एवं पवित्र होना अनिवार्य है तथा सत्य-कर्म के मार्गदर्शन अथवा ज्ञान के अभाव में किसी भी व्यक्ति की शुद्ध एवं पवित्र आत्मा पुनः असत्य कर्म में लिप्त हो सकते है अतः जिस व्यक्ति की आत्मा शुद्ध एवं पवित्र हो गया है उन्हें सत्य-कर्म का मार्गदर्शन अथवा ज्ञान प्राप्त करना अनिवार्य है।
मोक्ष अथवा शांति: किसी भी व्यक्ति को जीवित रहते हुए केवल अपनी संतान के द्वारा ही मोक्ष अथवा शांति प्राप्त हो सकता है एवं जिस संतान की आत्मा शुद्ध एवं पवित्र है तथा सत्य-कर्म में लिप्त है केवल ऐसी संतान ही अपने माता या पिता को जीवित रहते हुए मोक्ष अथवा शांति प्रदान करने में सक्षम हो सकते है अन्यथा जिस संतान की आत्मा अशुद्ध या अपवित्र है तथा असत्य-कर्म या मिश्रित कर्म में लिप्त है ऐसी संतान दुर्भाग्य से अपने माता या पिता के मृत्यु का कारण बन जाते है।
जब हमारा घर गन्दा होता है तो उसे हम स्वयं साफ़ करते है, यदि हमारा शरीर गन्दा होता है तो उसे भी हम स्वयं साफ़ करते है और यदि हमारा कपड़ा गन्दा हो जाता है तो उसे भी हम स्वयं साफ़ करते है तथा विषम प्रस्थतियों में किसी अन्य व्यक्ति से साफ़ करवाते है किन्तु कभी भी हम अपने घर, शरीर या कपड़ा की गंदगी को छोड़ते नहीं है अन्यथा गंदगी से बीमारी होने का भय रहता है और यदि सही समय पर बीमारी का इलाज नहीं किया गया तो भविष्य में यह बीमारी एक लाईलाज बीमारी बन जाता है और इस लाईलाज बीमारी से हमारे शरीर की मृत्यु होने का भय रहता है ठीक इसी प्रकार जब हमारी शुद्ध एवं पवित्र आत्मा असत्य-कर्म करने से अशुद्ध या अपवित्र होता है तो इसे भी हम स्वयं साफ़ करते है एवं विषम प्रस्थति में किसी अन्य व्यक्ति का चुनाव करते है किन्तु यह अन्य व्यक्ति हमारे शुद्ध एवं पवित्र आत्मा की मुख्य गंदगी असत्य-कर्म को साफ करने का ढोंग करते है और केवल अपना स्वार्थ सिद्ध करते है तथा हमारे शुद्ध एवं पवित्र आत्मा की मुख्य गंदगी असत्य-कर्म को छोड़ देते है जिसके कारण हमारी शुद्ध एवं पवित्र आत्मा अशुद्ध एवं अपवित्र हो जाता है और निरंतर असत्य-कर्म करने से हमारी शुद्ध एवं पवित्र आत्मा के मृत्यु होने का भय रहता है जिससे सत्य-कर्म करना दुर्लभ या असंभव हो जाता है एवं सत्य-कर्म के द्वारा सुख, समृद्धि एवं शांति प्राप्त करना भी दुर्लभ या असंभव हो जाता है।
यदि किसी व्यक्ति को अपने आत्म-शक्ति का ज्ञान नहीं है तो ऐसे व्यक्ति के लिए सत्य-कर्म एवं असत्य-कर्म में कोई भी अंतर नहीं है एवं ज्ञान के अभाव में निरंतर असत्य-कर्म करने से आत्म-शक्ति सदैव के लिए नष्ट हो जाता है किन्तु कोई भी व्यक्ति पुनः अपने आत्म-शक्ति को जागृत करके सत्य-कर्म कर सकते है।
किसी भी व्यक्ति को सत्य-कर्म का ज्ञान अथवा मार्गदर्शन प्रदान करना संभव नहीं है क्योकिं सत्य-कर्म करने के लिए आत्म-शक्ति का जागृत होना अनिवार्य है एवं कोई भी व्यक्ति अपने आत्म-शक्ति से सत्य-कर्म करके अपने जीवन में सुख, समृद्धि एवं शांति प्राप्त कर सकते है तथा देव अथवा ईश्वर भी बन सकते है।
सम्पूर्ण विश्व देव-भूमि है और हम सभी उस एक परमपिता परमेश्वर की संतान स्वयं ईश्वर है इसलिए हम सभी को सत्य-कर्म करना चाहिए, सत्य-कर्म के द्वारा कोई भी व्यक्ति ईश्वर बन सकते है किन्तु कभी भी सत्य-कर्म या असत्य-कर्म के द्वारा परमेश्वर बनने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए अन्यथा मृत्यु निश्चित है।
परमेश्वर एक है एवं कोई भी ईश्वर असत्य-कर्म के द्वारा परमेश्वर बन सकते है किन्तु किसी भी ईश्वर को परमेश्वर बनने के लिए असत्य-कर्म नहीं करना चाहिए अन्यथा असत्य-कर्म के परिणाम स्वरुप मृत्यु निश्चित है तथा परमेश्वर बनने से बचने के लिए ईश्वर एवं परमेश्वर का ज्ञान होना अनिवार्य है अन्यथा मृत्यु निश्चित है।
किसी भी ईश्वर को निस्वार्थ भाव से पूजा, भक्ति एवं सेवा करके अथवा मंत्रों के उच्चारण से प्रशन्न करके अपने वश में किया जा सकता है किन्तु जिस व्यक्ति को पूजा, भक्ति एवं सेवा करने की वास्तविक विधि या मंत्रों का ज्ञान नहीं है उस व्यक्ति के लिए किसी भी ईश्वर को वश में करना दुर्लभ या असंभव है।
परमेश्वार एक है तथा परमेश्वार को निस्वार्थ भाव से पूजा, भक्ति एवं सेवा करके अथवा मंत्रों के उच्चारण से प्रशन्न करके अपने वश में नहीं किया जा सकता है, परमेश्वर को वश में करने के लिए सत्य-कर्म करना अनिवार्य है एवं जिस व्यक्ति को सत्य-कर्म का ज्ञान नहीं है उसके लिए परमेश्वर को वश में करना दुर्लभ है।
यदि किसी भी व्यक्ति के जीवन में किसी भी प्रकार का दुख, दरिद्रता या चिंता अथवा असाध्य बीमारी या समस्या है तो निश्चित ही यह स्वयं अथवा पूर्वजों के द्वारा किये गए असत्य-कर्म का फल है जो कर्ज अथवा ऋण के रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी चलता है तथा अगली संतान अथवा पीढ़ी को विरासत के रूप में प्राप्त होता है जबतक की यह कर्ज अथवा ऋण पूर्ण रूप से समाप्त नहीं हो जाता है तथा किसी भी प्रकार की समस्या के समाधान हेतु किसी भी व्यक्ति के लिए असत्य-कर्म का पूर्ण रूप से त्याग कर सत्य-कर्म करना अनिवार्य है तथा जिस व्यक्ति की आत्म-शक्ति जागृत है केवल ऐसे व्यक्ति ही सत्य-कर्म के द्वारा अपने किसी भी समस्या का स्थाई समाधान करने में सक्षम हो सकते है।
सत्य-कर्म का फल अमृत के समतुल्य है जिसका सेवन करने से किसी भी व्यक्ति के जीवन में सुख, समृद्धि एवं शांति प्राप्त होता है तथा असत्य-कर्म का फल विष के समतुल्य है जिसका सेवन करने से किसी भी व्यक्ति के जीवन में दुख, दरिद्रता एवं चिंता प्राप्त होता है, कोई भी व्यक्ति अपनी योग्यता एवं सामर्थ के अनुसार स्वयं अपनी इच्छा से आध्यात्मिक विश्वविद्यालय में प्रवेश करने के बाद अपने आत्म-शक्ति को जागृत करके सत्य-कर्म का मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते है तथा सत्य-कर्म के द्वारा अपने जीवन में सुख, समृद्धि एवं शांति प्राप्त कर सकते है तथा अपने परिवार एवं बच्चों के साथ दीर्घ आयु तक सुखमय जीवन व्यतीत करते हुए अंत में मोक्ष अथवा शांति भी प्राप्त कर सकते है।